नई दिल्ली। अहमदाबाद के जीएमडीसी मैदान में अपने 22 साल के युवा नेता हार्दिक पटेल की अगुआई में आरक्षण की मांग कर रहे पटेल समुदाय का आंदोलन पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच रहा है। तकरीबन 8 लाख पटेल समुदाय के लोगों की भीड़ के साथ हार्दिक पटेल इस बात पर अड़े हुए हैं कि जब तक गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल खुद उनका ज्ञापन स्वीकार करने नहीं आती हैं, तब तक वे आमरण अनशन पर रहेंगे।
आईबीएन खबर ने गुजरात के वरिष्ठ पत्रकारों, सामाजिक कार्यकताओं, समाजशास्त्री और लेखकों से इस आंदोलन की पृष्ठभूमि, आरक्षण की मांग और गुजरात में पटेलों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति को लेकर बात की, और यह जानने की कोशिश की कि क्या वाकई में गुजरात में पटेल समुदाय की आरक्षण की मांग जायज है। देखिए क्या कहते हैं यह सब आरक्षण को
किसका समर्थन है आंदोलन को? : पटेलों की आरक्षण की मांग पर अहमदाबाद में आयोजित रैली को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता जिग्नेश मोवानी कहते हैं कि पटेलों की आरक्षण की मांग पूरी तरह गलत है। वे कहते हैं कि जो पटेल समुदाय गुजरात में व्यापारी वर्ग का चेहरा है, उद्योग धंधों में शामिल है, उनके पास बड़ी मात्रा में खेती है, दुनिया की दो तिहाई डायमंड इंडस्ट्री पर उसका कब्जा है, यहां तक की गुजरात विधानसभा में उसके 50 फीसदी से ज्यादा विधायक हैं, और तो और गुजरात की मुख्यमंत्री भी पटेल है तो फिर उन्हें आरक्षण की क्या जरूरत है? वे कहते हैं कि एक तरह से ये पूरा आंदोलन संकुचित मानसिकता का प्रतीक है और गुजरात को कास्ट वॉर की ओर धकेलता है।
जिग्नेश इस आंदोलन के पीछे की पृष्ठभूमि के पीछे भाजपा की अंदरुनी कलह को भी मानते हैं, साथ ही वे इसे खड़े करने के पीछे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का हाथ मानने इंकार नहीं करते हैं! हालांकि वे कहते हैं कि ऐसा माना जा सकता है क्योंकि महज ढाई महीने में इतना बड़ा आंदोलन खड़ा कर देना आसान नहीं है। वे इसके पीछे वोटों का गणित भी बताते हैं। वे कहते हैं कि इस आंदोलन को एनआरआई पटेलों का भी समर्थन है और पैसा वहीं से आ रहा है।

ओबीसी कोटे के अंतर्गत पटेल समुदाय के लिए आरक्षण की मांग पर हो रहे आंदोलन की अगुवाई कर रहे हार्दिक पटेल ने आज अपनी महत्वाकांक्षी रैली कर सरकार को ललकारा।[/caption]
जो हर क्षेत्र में दबदबा रखते हैं उन्हें क्यों चाहिए आरक्षण? : इसी तरह इस आंदोलन को लेकर गुजरात यूनिवर्सिटी के गौरंग जानी पटेलों की इस आरक्षण की मांग को गलत बताते हैं। वे कहते हैं कि पाटीदार समाज गुजरात का सबसे बड़ा लैंड होल्डिंग समाज है और देश में 60 के दशक में जो भू-सुधार आंदोलन हुआ था, इसमें इस समाज को सबसे ज्यादा क्षत्रियों की जमीन इन्हें ही मिली थी।
गौरांग कहते हैं कि यही नहीं बल्कि पूरे गुजरात में जो भी नकदी फसलें होती हैं, वे भी इसी समाज के पास है और हर साल इससे यह समाज लाखों रुपये कमाते हैं। इस तरह से वे पटेलों की आरक्षण की मांग के आर्थिक आधार को तो बुनियादी रूप से ही गलत मानते हैं। वे कहते हैं कि दरअसल यह पूरा आंदोलन कई तरह के विरोधाभासों को सामने लाता है। एक तरह से सरकार की भी इसमें गलती है क्योंकि उसने इतने दिनों से आंदोलन चल रहा है, तो सरकार ने कभी भी कोई विज्ञापन देकर ओबीसी क्या है इसे समझाने की कोशिश नहीं की।
गौरांग खुद भी ओबीसी आरक्षण कमीशन के सदस्य हैं, वे कहते हैं कि यह बड़ा अजीब है कि इस आंदोलन के लिए सड़कों पर आने से पहले न तो पाटीदार अनामक आंदोलन समिति ने आरक्षण के लिए अपील की और न ही कोई बात। गौरांग के मुताबिक आज से 10 साल पहले तक कभी किसी समुदाय ने गुजरात में सरकारी नौकरी में कॉंट्रेक्ट पर रखे जाने के खिलाफ आंदोलन नहीं किया और आज यह आंदोलन अचानक से खड़ा हो गया।
वे कहते हैं कि एक तरह से पटेल समुदाय, न केवल आर्थिक, राजनीतिक, कृषि विकास बल्कि शैक्षेणिक और धार्मिक रूप से भी गुजरात में डॉमिंनेंट सोसायटी है। यहां कई विश्वविद्यालय में वीसी पटेल हैं, यहां का जो सबसे बड़ा धार्मिक संप्रदाय है, स्वामी नारायण संप्रदाय उसके प्रमुख स्वामी हैं, वह भी पटेल हैं। गौरांग कहते हैं कि यह आंदोलन पूरे देश को यह बताता है कि गुजरात का डेवलपमेंट मॉडल कितना कॉम्प्लिेकेटेड है। साथ ही जब यह गांव-गांव में फैलेगा तो यह कास्ट वॉर की ओर यकीनन जाएगा।
हिंसा नहीं हुई अब तक, यह अच्छी खबर है : इस आंदोलन को लेकर दिव्य भास्कर के मैगजीन एडिटर और वरिष्ठ पत्रकार कृष्णकांत उनडकट कहते हैं कि यह आंदोलन गलत है या सही, इस पर फिलहाल कुछ नहीं कहा जा सकता है, लेकिन यह बात तय है कि यह आंदोलन बताता है कि कुछ लोगों के पास सुविधाएं नहीं हैं और यदि नहीं है, तो उन्हें सुविधाएं मिलनी चाहिए।
वे कहते हैं कि यह गुजरात के इतिहास का सबसे बड़ा आंदोलन है और इसके साथ अच्छी बात यह है कि इतने महीनों से यह आंदोलन चल रहा है और एक भी हिंसा की घटना नहीं हुई है। कृष्णकांत जी कहते हैं कि अब यह घड़ी आ गई है कि सरकार को इसी आंदोलन के बहाने कम से कम रिजर्वेशन सिस्टम के बारे में सोचना चाहिए।
इसलिए कर रहे हैं आरक्षण की मांग : ‘शेपिंग ऑफ मॉर्डन गुजरात और रॉयल सिटी मेगा सिटी टू मेगा सिटी’ जैसी प्रसिद्ध किताबों के लेखक अच्युत याग्निक इस आंदोलन को एक नये तरह से देखते हैं। वे कहते हैं कि चूंकि यह कम्युनिटी गुजरात में डॉमिनेंट है और उद्योग, कृषि और यहां तक की कई एज्यूकेशन सेक्टर में भी खड़े हुए हैं, वे समृद्ध हैं। अच्युत कहते हैं कि दरअसल ये वो लोग हैं, जिन्होंने नकदी फसलों से पैसा कमाया और उसे लघु, मझोले उद्योगों में डाला, लेकिन मोदी के शासनकाल में केवल बड़े उद्योगों की ओर ध्यान दिया और ये सभी छोटे उद्योग बंद होते चले गए।
अच्युत के मुताबिक तकरीबन 60 हजार उद्योग बंद हो गए और उसका इंपेक्ट पटेल समुदाय पर ज्यादा हुआ। इसी तरह साउथ गुजरात में डायमंड इंडस्ट्री का डिक्लाइन हुआ और उसका भी प्रभाव इन पर हुआ, लिहाजा यही वजह है कि ये लोग जो आरक्षण मांग रहे हैं। हालांकि अच्युत के मुताबिक उनकी यह आरक्षण की मांग जायज नहीं है क्योंकि राजनीतिक रूप से भी पटेल काफी वर्चस्वशाली है। जाहिर है सरकार में 40 विधायक, 7 मंत्री, चीफ मिनिस्टर तक उनकी है सो यह मांग की बुनियाद ही गलत है।
हमारी मांग जायज है : वहीं दूसरी ओर ‘पाटीदार अनामत आंदोलन समिति’ के सह संयोजक धार्मिक मालवीया पटेल समुदाय की मांग को जायज बताते हैं। वे कहते हैं कि यह मांग उन लोगों के लिए है जो समाज में पिछड़े हैं और उनके पास सुविधाएं नहीं हैं। वे कहते हैं कि पटेलों में एक ऐसा बड़ा वर्ग है जो मजूरी कर रहा है, उनके पास शिक्षा नहीं है, नौकरियां नहीं है। लिहाजा उनकी यह मांग जायज हैं। धार्मिक कहते हैं यह आंदोलन कोई अचानक से शुरू नहीं हुआ है बल्कि यह गुजरात के कई शहरों में लंबे समय से चल रहा था और इसे सरकार ने दबाया है। ओबीसी कमी शन में अपील नहीं करने की बात पर धार्मिक कहते हैं कि उसमें अपील करने की बात ही नहीं है बल्कि इसके विपरित सरकार ने तकरीबन 166 आवेदनों को रिजेक्ट कर दिया है। साथ ही सरकार को चाहिए कि वह खुद आगे आकर हमारी स्थिति पर विचार करे और हमें आरक्षण दे। धार्मिक कहते हैं कि यह आंदोलन अब तब तक नहीं रुकेगा जब तक कि सरकार यह स्टैंड क्लीयर नहीं करती की वह हमें आरक्षण देना चाहती है या नहीं।