Thursday, 27 August 2015




रक्षाबन्धन की कथा 


भगवान श्रीकृष्ण और दौपदी


इतिहास


 में भाई-बहन के रिश्ते को सार्थक करता है भगवान श्री कृष्ण और द्रौपदी का रिश्ता। कृष्ण 



भगवान ने दुष्ट राजा शिशुपाल को मारा था। युद्ध के दौरान कृष्ण के बाएँ हाथ की अँगुली से खून




 बह रहा था। इसे देखकर द्रोपदी बेहद दुखी हुईं और उन्होंने अपनी साड़ी का टुकड़ा चीरकर कृष्ण 



की अँगुली में बाँधा जिससे उनका खून बहना बंद हो गया। तभी से कृष्ण ने द्रोपदी को अपनी


 बहन स्वीकार कर लिया था। वर्षों बाद जब पांडव द्रोपदी को जुए में हार गए थे और भरी सभा में


 उनका चीरहरण हो रहा था तब कृष्ण ने द्रोपदी की लाज बचाई थी।

 


देवराज इन्द्र और शची की कथा


रक्षा बंधन की एक कथा के अनुसारएक समयदेवताओं का राजा इन्द्रअपने शत्रु वृत्रासुर से हार


 गया. तब वह देवों के गुरु बृहस्पतिजी के पास गया. तब देवगुरु बृहस्पतिजी की सलाह से विजय


 प्राप्ति के लिये इन्द्र की पत्नी देवी शची ने इन्द्र को राखी बाँधी. और तब इन्द्र वज्र के निर्माण के 


लिये ऋषि दधिची की अस्थियां लेने के लिये गए. इन्द्र ने उनसे उनकी अस्थियां प्राप्त करके वज्र 


नामक शस्त्र बनाया. फिर वृत्रासुर पर आक्रमण करके उसे हराया और अपना स्वर्ग का राज्य पुनः प्राप्त किया. इस प्रकार रक्षा बंधन का महत्व बताया गया है.

 

संतोषी माता और भगवान गणेश

माता संतोषी के अवतार की कथा में यह कहा जाता है कि एक समय की बात है. राखी के त्यौंहार पर भगवान गणेश की बहिन ने भगवान गणेश को राखी बाँधी. परंतु भगवान गणेश के दोनों पुत्रों शुभ और लाभ को कोई राखी बाँधने वाला नहीं था क्योंकि उनकी कोई बहिन नहीं थी. इस बात से शुभ और लाभ बहुत मायूस हुए. तब दोनों ने भगवान गणेश और माता रिद्धि व सिद्धि से एक बहिन के लिए बहुत प्रार्थना की. भगवान गणेश ने दोनों पुत्रों शुभ और लाभ की प्रार्थना स्वीकार की और तब माता रिद्धि-सिद्धि द्वारा दैवीय ज्योति से संतोषी माता का अवतार हुआ. तब संतोषी माता ने शुभ और लाभ को राखी बाँधी.

 

राजा बलि और माता लक्ष्मी

एक पौराणिक कथा के अनुसार ऐसा माना जाता है कि दैत्यों का राजा बलि भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था. भगवान विष्णु इस राजा बलि से इतने प्रसन्न थे कि एक बार वे वैकुण्ठ धाम छोड़ कर राजा बलि के साम्राज्य की रक्षा के कार्य में लग गए. माता लक्ष्मी वैकुण्ठ धाम में अकेली रह गईं.


जब भगवान विष्णु बहुत समय तक वापिस वैकुण्ठ धाम को नहीं लौटेतब माता लक्ष्मी ने एक साधारण स्त्री का रूप धारण किया और राजा बलि के यहाँ पहुँच गयीं.  वहाँ माता लक्ष्मी ने अपने आपको एक निराश्रित महिला बताया जो अपने पति से बिछुड़ गयी है और पति के मिलने तक राजा बलि की शरण में रहना चाहती है. इस प्रकार माता लक्ष्मी ने बलि के यहाँ आश्रय पा लिया.


तत्पश्चात् सावन मास की पूर्णमासी को माता लक्ष्मी ने राजा बलि की कलाई पर रक्षा सूत्र बाँधा और राजा बलि से अपनी रक्षा का वचन लिया. तब बलि ने माता लक्ष्मी से सब सच जानना चाहा तो माता लक्ष्मी ने सब बात राजा बलि को सच सच बतला दी.


राजा बलि ने माता लक्ष्मी की सब बात सुन कर उनके प्रति अपना सम्मान प्रकट किया और भगवान विष्णु से माता लक्ष्मी के साथ वैकुण्ठ धाम लौटने की प्रार्थना की.

ऐसा कहा जाता है कि तब ही से रक्षा बंधन के दिन राखी बंधवाने के लिए बहिन को भाई द्वारा अपने घर आमंत्रित करने की प्रथा चल पड़ी.

 

राजा हुमायूँ और रानी कर्णवती

राखी से सम्बंधित राजस्थान अंचल की यह बहुत ही मार्मिक और प्रसिद्ध कहानी है. ऐसा कहा जाता है कि जब बहादुर शाह ने राजस्थान के चित्तौड़ प्रांत पर आक्रमण किया तो विधवा रानी कर्णवती ने पाया कि वह स्वयं को तथा अपने राज्य को बहादुर शाह से बचा पाने में सक्षम नहीं है. तब रानी कर्णवती ने हुमायूँ को राखी भेजी और अपनी रक्षा की प्रार्थना की. हुमायूँ ने कर्णवती की राखी को पूरा सम्मान दिया और प्रण किया कि वह राखी की लाज अवश्य रखेगा.


अपने प्रण को निभाने के लिए हुमायूँ एक विशाल सेना साथ ले कर तुरंत चित्तौड़ के लिए निकल पड़ा. परंतु जब तक हुमायूँ चित्तौड़ पहुंचा तब तक बहुत देर हो चुकी थी. बहादुर शाह चित्तौड़ पर कब्ज़ा कर चुका था.  ८ मार्च १५३५ का वह दिन राजस्थान के इतिहास में हमेशा एक घाव के रूप में रिसता है कि उस दिन रानी कर्णवती ने बहुत सी महिलाओं सहित जौहर किया. तब राखी की लाज रखते हुए हुमायूँ ने बहादुर शाह से युद्ध किया और विजय प्राप्त की. हुमायूं ने चित्तौड़ का राज रानी कर्णवती के पुत्र विक्रमजीत सिंह को सौंप दिया.


रानी कर्णवती और हुमायूं की इस राखी की पवित्रता को राजस्थान की मिट्टी कभी नहीं भुला

 सकेगीक्योंकि रानी कर्णवती और हुमायूँ के इस पवित्र रिश्ते और राखी के महत्व को राजस्थानी भाषा के अनेक कथाकारों और कवियों ने अपनी वाणी दे कर हमेशा हमेशा के लिए अमर कर दिया.



अलेक्जेंडर और पुरू 


अलेक्जेंडर व पुरू के बीच भी रक्षा सूत्र का बहुत पुराना नाता था। हमेशा विजयी रहने वाला 


अलेक्जेंडर भारतीय राजा पुरू की प्रखरता से काफी विचलित हुआ। इससे अलेक्जेंडर की पत्नी 


काफी तनाव में आ गईं थीं। उसने रक्षाबंधन के त्योहार के बारे में सुना था। सोउन्होंने भारतीय


 राजा पुरू को राखी भेजी। तब जाकर युद्ध की स्थिति समाप्त हुई थी। क्योंकि भारतीय राजा पुरू


ने अलेक्जेंडर की पत्नी को बहन मान लिया था।


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