Tuesday, 15 December 2015

GO for Uttarakhand Guest Teachers Recruitment

  1. Guests teacher will be selected at the posts of vacant Assitant Teachers LT and Lecturer posts.
  2. The guest faculty posts are purely on contractual basis and will be dismissed right after permanent teacher recruitment or filling up of seat with transfer.
  3. The visiting faculty will be selected on block level by a screening committee headed by DM and members are Chief Education Officer, District Education Officer, Principle of DIET, and a SC/ST member.
  4. Education qualification for the recruitment of guest teachers remain same as for regular teachers.
  5. A pool of applying candidates will be created at Block level which have to be twice of the number of vacancies in the block.
  6. Registration in employment office in Uttarakhand is mandatory.
  7. The application will be accepted through registered post only in every block.
  8. Screening committee will prepare the merit chart as per applications recieved.

Marks Calculation for Guest Teachers Recruitment in Uttarakhand

A. Assistant Teacher LT
  1. High School – (Percentage/10) X 1/2
  2. Intermediate – (Percentage/10) X 1/2
  3. Graduation - (Percentage/10) X 4
  4. TET 2 – (Percentage/10) X 4
  5. Training (BEd/ LT)
    • Written – (Percentage/10) X 1/2
    • Practicle – Percentage/10) X 1/2
B. Lecturer
  1. High School – (Percentage/10) X 1/2
  2. Intermediate – (Percentage/10) X 1/2
  3. Graduation – (Percentage/10) X 4
  4. Post Graduation – (Percentage/10) X 4
  5. Training (BEd/ LT)
    • Written – (Percentage/10) X 1/2
    • Practicle – Percentage/10) X 1/2
9. After preparation of merit, candiates will be posted to schools where vacant seats are found, starting from Durgam to Sugam.
10. Stipend of Rs 125/- for LT and Rs 150/- for Lecturer per period will be given which atmost rise to Rs 15000/- per month.
11. 15 days leaves in a year are allowed for guests teachers

GO for Uttarakhand Guest Teachers Recruitment

  1. Guests teacher will be selected at the posts of vacant Assitant Teachers LT and Lecturer posts.
  2. The guest faculty posts are purely on contractual basis and will be dismissed right after permanent teacher recruitment or filling up of seat with transfer.
  3. The visiting faculty will be selected on block level by a screening committee headed by DM and members are Chief Education Officer, District Education Officer, Principle of DIET, and a SC/ST member.
  4. Education qualification for the recruitment of guest teachers remain same as for regular teachers.
  5. A pool of applying candidates will be created at Block level which have to be twice of the number of vacancies in the block.
  6. Registration in employment office in Uttarakhand is mandatory.
  7. The application will be accepted through registered post only in every block.
  8. Screening committee will prepare the merit chart as per applications recieved.

Marks Calculation for Guest Teachers Recruitment in Uttarakhand

A. Assistant Teacher LT
  1. High School – (Percentage/10) X 1/2
  2. Intermediate – (Percentage/10) X 1/2
  3. Graduation - (Percentage/10) X 4
  4. TET 2 – (Percentage/10) X 4
  5. Training (BEd/ LT)
    • Written – (Percentage/10) X 1/2
    • Practicle – Percentage/10) X 1/2
B. Lecturer
  1. High School – (Percentage/10) X 1/2
  2. Intermediate – (Percentage/10) X 1/2
  3. Graduation – (Percentage/10) X 4
  4. Post Graduation – (Percentage/10) X 4
  5. Training (BEd/ LT)
    • Written – (Percentage/10) X 1/2
    • Practicle – Percentage/10) X 1/2
9. After preparation of merit, candiates will be posted to schools where vacant seats are found, starting from Durgam to Sugam.
10. Stipend of Rs 125/- for LT and Rs 150/- for Lecturer per period will be given which atmost rise to Rs 15000/- per month.
11. 15 days leaves in a year are allowed for guests teachers

Thursday, 27 August 2015






रक्षाबन्धन की कथा 


भगवान श्रीकृष्ण और दौपदी


इतिहास


 में भाई-बहन के रिश्ते को सार्थक करता है भगवान श्री कृष्ण और द्रौपदी का रिश्ता। कृष्ण 



भगवान ने दुष्ट राजा शिशुपाल को मारा था। युद्ध के दौरान कृष्ण के बाएँ हाथ की अँगुली से खून




 बह रहा था। इसे देखकर द्रोपदी बेहद दुखी हुईं और उन्होंने अपनी साड़ी का टुकड़ा चीरकर कृष्ण 



की अँगुली में बाँधा जिससे उनका खून बहना बंद हो गया। तभी से कृष्ण ने द्रोपदी को अपनी


 बहन स्वीकार कर लिया था। वर्षों बाद जब पांडव द्रोपदी को जुए में हार गए थे और भरी सभा में


 उनका चीरहरण हो रहा था तब कृष्ण ने द्रोपदी की लाज बचाई थी।

 


देवराज इन्द्र और शची की कथा


रक्षा बंधन की एक कथा के अनुसारएक समयदेवताओं का राजा इन्द्रअपने शत्रु वृत्रासुर से हार


 गया. तब वह देवों के गुरु बृहस्पतिजी के पास गया. तब देवगुरु बृहस्पतिजी की सलाह से विजय


 प्राप्ति के लिये इन्द्र की पत्नी देवी शची ने इन्द्र को राखी बाँधी. और तब इन्द्र वज्र के निर्माण के 


लिये ऋषि दधिची की अस्थियां लेने के लिये गए. इन्द्र ने उनसे उनकी अस्थियां प्राप्त करके वज्र 


नामक शस्त्र बनाया. फिर वृत्रासुर पर आक्रमण करके उसे हराया और अपना स्वर्ग का राज्य पुनः प्राप्त किया. इस प्रकार रक्षा बंधन का महत्व बताया गया है.

 

संतोषी माता और भगवान गणेश

माता संतोषी के अवतार की कथा में यह कहा जाता है कि एक समय की बात है. राखी के त्यौंहार पर भगवान गणेश की बहिन ने भगवान गणेश को राखी बाँधी. परंतु भगवान गणेश के दोनों पुत्रों शुभ और लाभ को कोई राखी बाँधने वाला नहीं था क्योंकि उनकी कोई बहिन नहीं थी. इस बात से शुभ और लाभ बहुत मायूस हुए. तब दोनों ने भगवान गणेश और माता रिद्धि व सिद्धि से एक बहिन के लिए बहुत प्रार्थना की. भगवान गणेश ने दोनों पुत्रों शुभ और लाभ की प्रार्थना स्वीकार की और तब माता रिद्धि-सिद्धि द्वारा दैवीय ज्योति से संतोषी माता का अवतार हुआ. तब संतोषी माता ने शुभ और लाभ को राखी बाँधी.

 

राजा बलि और माता लक्ष्मी

एक पौराणिक कथा के अनुसार ऐसा माना जाता है कि दैत्यों का राजा बलि भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था. भगवान विष्णु इस राजा बलि से इतने प्रसन्न थे कि एक बार वे वैकुण्ठ धाम छोड़ कर राजा बलि के साम्राज्य की रक्षा के कार्य में लग गए. माता लक्ष्मी वैकुण्ठ धाम में अकेली रह गईं.


जब भगवान विष्णु बहुत समय तक वापिस वैकुण्ठ धाम को नहीं लौटेतब माता लक्ष्मी ने एक साधारण स्त्री का रूप धारण किया और राजा बलि के यहाँ पहुँच गयीं.  वहाँ माता लक्ष्मी ने अपने आपको एक निराश्रित महिला बताया जो अपने पति से बिछुड़ गयी है और पति के मिलने तक राजा बलि की शरण में रहना चाहती है. इस प्रकार माता लक्ष्मी ने बलि के यहाँ आश्रय पा लिया.


तत्पश्चात् सावन मास की पूर्णमासी को माता लक्ष्मी ने राजा बलि की कलाई पर रक्षा सूत्र बाँधा और राजा बलि से अपनी रक्षा का वचन लिया. तब बलि ने माता लक्ष्मी से सब सच जानना चाहा तो माता लक्ष्मी ने सब बात राजा बलि को सच सच बतला दी.


राजा बलि ने माता लक्ष्मी की सब बात सुन कर उनके प्रति अपना सम्मान प्रकट किया और भगवान विष्णु से माता लक्ष्मी के साथ वैकुण्ठ धाम लौटने की प्रार्थना की.

ऐसा कहा जाता है कि तब ही से रक्षा बंधन के दिन राखी बंधवाने के लिए बहिन को भाई द्वारा अपने घर आमंत्रित करने की प्रथा चल पड़ी.

 

राजा हुमायूँ और रानी कर्णवती

राखी से सम्बंधित राजस्थान अंचल की यह बहुत ही मार्मिक और प्रसिद्ध कहानी है. ऐसा कहा जाता है कि जब बहादुर शाह ने राजस्थान के चित्तौड़ प्रांत पर आक्रमण किया तो विधवा रानी कर्णवती ने पाया कि वह स्वयं को तथा अपने राज्य को बहादुर शाह से बचा पाने में सक्षम नहीं है. तब रानी कर्णवती ने हुमायूँ को राखी भेजी और अपनी रक्षा की प्रार्थना की. हुमायूँ ने कर्णवती की राखी को पूरा सम्मान दिया और प्रण किया कि वह राखी की लाज अवश्य रखेगा.


अपने प्रण को निभाने के लिए हुमायूँ एक विशाल सेना साथ ले कर तुरंत चित्तौड़ के लिए निकल पड़ा. परंतु जब तक हुमायूँ चित्तौड़ पहुंचा तब तक बहुत देर हो चुकी थी. बहादुर शाह चित्तौड़ पर कब्ज़ा कर चुका था.  ८ मार्च १५३५ का वह दिन राजस्थान के इतिहास में हमेशा एक घाव के रूप में रिसता है कि उस दिन रानी कर्णवती ने बहुत सी महिलाओं सहित जौहर किया. तब राखी की लाज रखते हुए हुमायूँ ने बहादुर शाह से युद्ध किया और विजय प्राप्त की. हुमायूं ने चित्तौड़ का राज रानी कर्णवती के पुत्र विक्रमजीत सिंह को सौंप दिया.


रानी कर्णवती और हुमायूं की इस राखी की पवित्रता को राजस्थान की मिट्टी कभी नहीं भुला

 सकेगीक्योंकि रानी कर्णवती और हुमायूँ के इस पवित्र रिश्ते और राखी के महत्व को राजस्थानी भाषा के अनेक कथाकारों और कवियों ने अपनी वाणी दे कर हमेशा हमेशा के लिए अमर कर दिया.



अलेक्जेंडर और पुरू 


अलेक्जेंडर व पुरू के बीच भी रक्षा सूत्र का बहुत पुराना नाता था। हमेशा विजयी रहने वाला 


अलेक्जेंडर भारतीय राजा पुरू की प्रखरता से काफी विचलित हुआ। इससे अलेक्जेंडर की पत्नी 


काफी तनाव में आ गईं थीं। उसने रक्षाबंधन के त्योहार के बारे में सुना था। सोउन्होंने भारतीय


 राजा पुरू को राखी भेजी। तब जाकर युद्ध की स्थिति समाप्त हुई थी। क्योंकि भारतीय राजा पुरू


ने अलेक्जेंडर की पत्नी को बहन मान लिया था।


Saturday, 22 August 2015

यूं तो भारत का संविधान जाति, धर्म, लिंग, भाषा के आधार पर किसी भी वर्ग में भेद नहीं करता। लेकिन आज वो सब कुछ हो रहा है जो नही होना चाहिये मसलन जाति, धर्म लिंग भाषा के आधार पर ही हमारे चतुर नेता आदमी-आदमी के बीच महिला-महिला के बीच खाई बढ़ाने की पुरजोर कोशिश में दिन रात जुटे हुए हैं। फिर बात चाहे दंगे भड़काने के आरोपों की हो, चुनाव में टिकिट बांटने की हो, या आरक्षण की हो। संविधान निर्माण बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर ने सपने में भी नहीं सोचा होगा जिन दबे कुचले लोगों को मुख्य धारा में लाने के लिए जो 10 वर्ष का संकल्प लिया था उसे आजीवन जारी रख भविष्य में लोग इसी के इर्द-गिर्द राजनीति करेंगे।
यूं तो सुप्रीम कोर्ट नौकरियों पदोन्नति में आरक्षण को ले एवं तय सीमा से ज्यादा आरक्षण को लें समय-समय पर राज्य सरकारों को हिदायत देता रहा है एवं आरक्षण के पुनः रिव्यू की बात कह चुका है ताकि केवल जरूरतमदों को इसका न केवल वास्तविक लाभ मिल सके बल्कि नेक नियत की मंशा भी पूरी हो स्वतंत्रता के पश्चात् आरक्षण बढ़ा ही है जबकि समय-समय पर परीक्षण कर इसको कम करना चाहिए था।
हाल ही में जाट समुदाय के लोगों के आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट ने इसे रद्द करते हुए जाति आधारित आरक्षण ही मूलतः गलत है यदि केाई एक गलती लंबे समय से चलती आ रही इसका मतलब ये कतई नहीं है कि अब इसे नहीं सुधारा जा सकता।
आज आरक्षण एक प्रिव्लेज है जो आरक्षण की मलाई खा रहे हैं वे इस दायरे से निकलना नहीं चाहते और जो इस दायरे में नहीं आते वे केवल इससे जुड़ने के लिए गृहयुद्ध की स्थिति को निर्मित करने पर उतारू है।
आज आरक्षण प्राप्त एक अभिजात्य वर्ग है जिसमें सांसद, विधायक, आई.ए.एस. प्रोफेसर, इंजीनियर, डाॅक्टर एवं अन्य प्रशासनिक अधिकारियों एवं कर्मचारियों की लम्बी फौज है जो तीन पीढ़ियों से इस पर अपना हक जमाए बैठा है। 8 अगस्त 1930 को शोषित वर्ग के सम्मेलन में डाॅ. अम्बेडकर ने कहा था ‘‘हमें अपना रास्ता स्वयं बनाना होगा और स्वयं राजनीतिक शक्ति शोषितों की समस्या का निवारण नहीं हो सकती, उनका उद्धार समाज में उनका उचित स्थान पाने में निहित हैं उनको अपना बुरा रहने का बुरा तरीका बदलना होगा, उनको शिक्षित होना चाहिए।’’
बाबा साहेब ने इस वर्ग के लोगों को शिक्षित होने पर ज्यदा जौर दिया वनस्पत थ्योरी के सुप्रीम कोर्ट के हाल के फैसले से फिर एक नई बहस सी छिड़ गई है। मसलन आरक्षण क्यों? किसे, कैसे? कब तक जातिगत आरक्षण के जगह जाति रहित आरक्षण कैसे हो, इस पर विधायिका को जाति धर्म, वर्ग से ऊपर उठ सोचना चाहिए।
केवल जाति कैसे आरक्षण का आधार हो सकती हैं? पिछड़ापन क्या जातिगत हैं? आज आरक्षण को ले सामान्य वर्ग अर्थात् खुला संवर्ग क्या इन्हें भारत में जीने का अधिकार नहीं हैं? क्या ये भारत के नागरिक नहीं हैं? क्या इनके हितों की रक्षा सरकार का दायित्व नहीं हैं? क्या वर्ग संघर्ष का सरकार इंतजार कर रही हंै? फिर क्यों नहीं जाति रहित आरक्षण पर सभी नेता राजनीतिक पाटियों में एका होता?
आज मायावती, पासवान, मुलायम सिंह यादव जैसे अन्य समृद्ध शक्तिशाली किस मायने में अन्य से कम है। इन जैसे लोग जो शक्तिशाली हैं, क्यों नहीं जाति रहित आरक्षण की आवाज बुलन्द करते?
निःसंदेह आज जाति आधारित आरक्षण समाज में द्वेष फैलाने का ही कार्य कर रहा है। यह स्थिति एवं परिस्थिति न तो समाज के लिए शुभ है और न ही सरकारों के लिए। होना तो यह चाहिए गरीब, वास्तविक पिछड़े दलित लोगों को शिक्षा फ्री कर देना चाहिए ताकि बाबा भीमराव अम्बेडकर की मंशा के अनुरूप ये शिक्षित हो न कि केवल आरक्षण की वैशाखी हो। इसमें सभी माननीय सांसद, विधायक, बुद्धजीवियों को मिलकर एक मुहीम चला। संविधान में आवश्यक संशोधन कर स्वस्थ्य जाति रहित समाज के निर्माण में महति भूमिका निभानी होगी।
-

Wednesday, 19 August 2015

संविधान के अनुच्छेद 15(1) में निर्दिष्ट है कि, ‘राज्य, किसी नागरिक के विरुद्ध केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान या इनमें से किसी के आधार पर कोई विभेद नहीं करेगा।’ यानी अनुच्छेद 15, भारत के प्रत्येक नागरिक को समता के व्यवहार की गारंटी देता है। इसके बावजूद, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़े वर्ग को ‘जाति’ के आधार पर ही आरक्षण प्रदान किया गया ।
‘जाति’ आरक्षण का वैध आधार तब बनी जब स्वतंत्र भारत में संसद द्वारा सन 1951 में संविधान का प्रथम संशोधन ‘जाति’ को ‘आरक्षण का आधार’ बनाने के लिए किया गया। इस संशोधन के जरिये अनुच्छेद 15(4), जो ‘आरक्षण अनुच्छेद’ के नाम से जाना जाता है, संविधान में जोड़ा गया, जिसमें कहा गया है कि, ‘इस अनुच्छेद की या अनुच्छेद 29 के खण्ड (2) की कोई बात, राज्य को सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े नागरिकों के किन्हीं वर्गों की उन्नति के लिए या अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए कोई विशेष उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी।’ यह एक दृष्टि से अनुच्छेद 15 का, अर्थात सभी के साथ समतापूर्ण न्याय करने के तत्व का, उल्लंघन है। उक्त संविधान संशोधन के उदेश्यों को उचित ठहराते हुए ‘पी.राजेंद्रन वि. मद्रास राज्य’ के मामले में मुख्य न्यायाधीश वांचू ने स्थिति को साफ करते हुए कहा कि, ‘अगर प्रश्नाधीन आरक्षण केवल जाति के आधार पर किया जाता और उसके लिए सम्बंधित जाति के सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन को आधार नहीं बनाया जाता तो वह अनुच्छेद 15(1) का उल्लंघन होता। परन्तु यह नहीं भुलाया जाना चहिये कि जाति, नागरिकों का एक वर्ग भी है और अगर कोई जाति सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ी है, तो उस जाति को इस आधार पर आरक्षण प्रदान किया जा सकता है कि वह अनुच्छेद 15(4) के उपबंधों के अधीन, नागरिकों का सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ा वर्ग है’ (एससीआर पी 790) ।
न्यायाधीश वांचू के इस तर्क से स्पष्ट हो जाता है कि जाति, भारत में सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े हुए वर्गों की पहचान करने का वैध व उचित माध्यम है व ‘जाति,’ भारतीय ‘नागरिकों का समूह’ है । दूसरे शब्दों में, ‘जाति के पिछड़ेपन’ का निर्धारण कराने के दो मापदंड हैं सामाजिक पिछड़ापन और शैक्षिक पिछड़ापन। जो जाति या जातियां, इन दोनों शर्तों को पूरा करती हैं, वे केंद्र तथा राज्यों की सरकारों द्वारा ‘पिछड़ी जाति’ घोषित की जा सकती हैं। भारतीय समाज के यथार्थ को और स्पष्ट करते हुए वांचू आगे कहते हैं कि, ‘यह सच है कि जाति व्यवस्था का हिन्दू समाज में प्राधान्य है और सामाजिक ढांचे के संपूर्ण ताने-बाने में वह व्याप्त है। अत:, जाति की कसौटी को, पिछड़े वर्गों की पहचान करने की अन्य स्थापित व सर्वसम्मत कसौटियों से अलग करके नहीं देखा जा सकता।’
जाति के बगैर हिन्दू धर्म की कल्पना भी नहीं की जा सकती। हिन्दू धर्म, जातियों से बुना हुआ जाल है। इस जाल में सामाजिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक, आर्थिक आदि बहुत सारी असमानताएं, विसंगतियां और समस्याएं हैं। इस जाल की अधिकांश जातियां शैक्षणिक तथा सामाजिक दृष्टि से पिछड़ी हुई थीं और आज भी हैं। अनुच्छेद 14(4) पर संविधानसभा बहस में पिछड़ेपन को तय करने का ‘जाति को एकमात्र मापदण्ड’ बताते हुए संविधान के शिल्पकार और स्वतंत्र भारत के प्रथम कानून मंत्री डॉ. बीआर आम्बेडकर ने कहा था कि, ‘पिछड़े वर्ग, कुछ विशिष्ट जातियों के समूह से अधिक कुछ नहीं हैं।’ अगला महत्त्वपूर्ण और केंद्रीय प्रश्न यह है कि क्या जाति, जिसके नाम पर व्यक्तियों के समूह पहचाने जाते हैं, को उस जाति को सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ा वर्ग निरुपित करने की कसौटी माना जा सकता है; और यदि हाँ, तो क्या वह सामाजिक व शैक्षणिक पिछड़ेपन के निर्धारण की एकमात्र या सबसे महत्पूर्ण या कई में से एक कसौटी होगी?। डॉ. आंबेडकर ने पूर्णत: स्पष्ट कर दिया कि आरक्षण के लिए पात्र ‘जातियां’, व्यक्तियों के ऐसे समूह हैं, जो सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े हुए हैं व इन समूहों का संग्रह ही ‘पिछड़ा वर्ग’ है। पिछड़े वर्गों में अनुसूचित जातियां, जनजातियां, अन्य पिछड़ा वर्ग या इनसे अतिरिक्त अन्य जातियां भी शामिल हो सकती हैं ।
इन वर्गों के शैक्षणिक पिछड़ेपन का अर्थ एकदम साफ़ है – या तो वे शिक्षा से पूरी तरह वंचित हैं या उनमें शिक्षा का स्तर बहुत कम है। और सामाजिक पिछड़ेपन का क्या अर्थ है? हिंदू धर्म की समाज व्यवस्था में कुछ जातियों को कोई गरिमा प्राप्त नहीं है, जाति के नाम पर उन्हें कोई प्रतिष्ठा नहीं मिलती बल्कि उन्हें अपमानित किया जाता है। ‘निचली जातियां’, परंपरा से अपनी जीविका चलाने के लिए गंदा काम करनेवाली जातियां हैं – जैसे मैला ढोने वाली आदि। इसलिए ‘निचली जाति’, ‘असम्मान की अवस्था’ है और यही ‘सामाजिक पिछड़ापन’ है। ‘असम्मान की अवस्था’ ने जाति विशेष को मानवीय विकास के सभी अवसरों से वंचित कर दिया। परिणामत: जातियों के कुछ सामाजिक समूह उन्नति की दौड़ में अन्य समूहों से कोसो पीछे रह गये। अत: यह स्पष्ट है कि सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन के सन्दर्भ में ‘जाति’ कैसे आरक्षण का आधार बन गयी।
सम्मति निर्माण की प्रक्रिया 
आरक्षण देने या न देने और आरक्षण का आधार ‘जाति’ को बनाने या न बनाने के मुद्दों पर केंद्र और राज्यों की सरकारों के साथ ही सर्वोच्च और उच्च न्यायालयों द्वारा कई निर्णय दिए गए हैं ।कुछ निर्णय इसके विरोध में थे तो अधिकतर इसके समर्थन में। इस संदर्भ में सरकारों और न्यायालयों के सारे निर्णयों को संज्ञान में लेते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक निर्णय में स्पष्ट कर दिया कि ‘इस न्यायालय द्वारा, सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों की पहचान करने में जाति की कसौटी की प्रासंगिकता और महत्व के सम्बन्ध में दिए गए विभिन्न निर्णयों का सार-संक्षेप यह है कि अनुच्छेद 16(4) के उपबंधो के अधीन, नागरिकों के किसी समूह या वर्ग के सामाजिक व शैक्षणिक पिछड़ेपन का निर्धारण कर उसे पछड़े वर्गों में शामिल करने की जाति न तो एकमात्र कसौटी हो सकती है और ना ही जाति को वर्ग के समकक्ष माना जा सकता है। तथापि, हिन्दू समाज में, जाति, नागरिकों के किसी वर्ग के पिछड़ेपन के निर्धारण का मुख्य करक या प्रमुख कसौटी है। अत: जब तक कि जाति सामाजिक, आर्थिक व शैक्षणिक पिछड़ेपन, जो कि पिछड़े वर्ग की पहचान के स्थापित आधार हैं, की प्राथमिक कसौटी पर खरी नहीं उतरती, तब तक सामान्यत: उसे अनुच्छेद 16(4) के उपबंधों के अधीन, नागरिकों का पिछड़ा वर्ग नहीं माना जा सकता, सिवाय उन अपवादात्मक परिस्थितियों में जब कि कोई जाति, परंपरागत रूप से निचले दर्जे के ऐसे कार्य से अपनी जीविका चलाती हो, जो सामाजिक पिछड़ेपन का द्योतक हो’।
सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय ने जाति को आरक्षण का आधार बनाने पर अंतिम मोहर लगा थी । इस प्रकार, जाति को आरक्षण का आधार बनने के लिए विद्वतजनों की चर्चाओं, सरकार के विविध नियम-कानूनों और न्यायालयों के अनेक निर्णयों से गुजरना पड़ा है । उसके बाद कहीं जाकर भारत में ‘जाति’, आरक्षण के आधार के रूप में स्थापित हो सकी । इस अवधारणा के समक्ष अब कोई चुनौती उपस्थित नहीं है।


कुछ लोग तर्क देते हैं कि गरीबी जाती देख कर नहीं आती फिर आरक्षण जाती देखकर क्यों जाता है ? वे अपनी बात को बजाय यूं कहने की वे आरक्षण के विरोधी हैं इसलिये उसे घुमा फिरा कर कहते हैं। होना तो यह चाहिये था कि जब आरक्षण का लाभ उठा रहे किसी परिवार का सदस्य सरकारी नौकरी पा गया तो उसके बाद से उस परिवार से आरक्षण की सहूलियत वापस ले लेनी चाहिये थी क्योंकि अब वह उस धारा में आगया है जिसके लिये आरक्षण का प्रावधान किया गया था। बहरहाल बात आर्थिक आधार के आरक्षण की हो रही थी जिसे कई कारणों से स्वीकार नहीं किया जा सकता। जब आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की बात आयेगी तो उसके लिये जरूरत होगी आय प्रमाण पत्र की जिसे येन केन प्राकरेण तथाकथित ऊंची जाती वाले सबसे पहले फर्जी आय प्रमाण पत्र बनाकर उन गरीबों का हक छीन लेंगे जिनके लिये आरक्षण का प्रावधान किया गया है फिर पूंजीवाद का ऐसा भयवाह चेहरा सामने आयेगा देश कई सौ साल पहले के वर्णवादी व्यवस्था में पहुंच जायेगा। आप अपने दिमाग पर जोर डालकर सोचें और निर्णय लें कि क्या ऐसा होगा या नहीं ? जहां पानी का मटका छूने भर से ही दलित का हाथ काट दिया जाता हो फिर उसे कथित ऊंची जात वाले स्वर्ण कैसे उस लाभ को उठाने देंगे जो वह आज अपनी जाती के आधार पर उठा रहा है। दूसरी बात आती है जाती व्यवस्था समाप्त करने की उसमें यह भी देखा जाना, जांचा परखा जाना जरूरी है कि जब जब इस तरह की आवाजें उठाई जाती हैं उसमें उच्च वर्ग या तो होता ही नहीं है और अगर होता भी है तो कितना ? अगर ऊंची जाती वाले अंतर्जातीय विवाह व्यवस्था को अपना लें तो आरक्षण का खेल ही समाप्त हो जायेगा। फिर न किसी से यह कहने की जरूरत कि आरक्षण जाती के आधार पर हो या आर्थिक आधार पर। अव्वल तो यह सारा खेल ही इसलिये है कि कमसे समाज के अति पिछड़े वर्ग को ऊपर उठाया जा सके। मगर क्या उच्च जाती वाले ब्राहम्ण, बनिया, ठाकुर, एंव शेख, सैय्यद, मुगल, पठान, ब्राह्मण मुस्लिम, ठाकुर मुस्लिम, यह गंवारा करेंगे कि वे अपने बच्चों का ब्याह आदीवासी दलित समुदाय क्रमश हिंदु या मुस्लिम में करें ? अगर इस सवाल का जवाब हां में हैं तो फिर आरक्षण को खत्म कर देना चाहिये और अगर इस सवाल का उत्तर न है तो आरक्षण को और बढ़ाना होगा और तब तक जारी रखना होगा जब तक अंतर्जातीय विवाह व्यवस्था नहीं हो जाती। यही एक मात्र तरीका है आरक्षण को खत्म करने का।