एक दिन हो रही थी हम दोस्तों की आमसभा,
जिसमें आरक्षण ही बन गया था अहम् मुद्दा ।
मैंने कहा कि क्या हाल हो गया है आज देश का ?
अब तो मानते हो ना कि है ये आरक्षण भद्दा ।
तभी एक मित्र तपाक से बोला, तुम्हारी बात तो सच है,
लेकिन इससे बचने का क्या है उपाय ?
इससे पीड़ित हो रहे हैं सब लोग,
तुरंत दूसरा दोस्त बोल पड़ा कि कोई फायदा नहीं,
इस देश में हम जैसों की सुनने वाला कोई है ही नहीं ।
औरों को तो मिलता है हर चीज में आरक्षण,
लेकिन हमें तो इस आरक्षण से कोई फायदा ही नहीं ।
फिर पहला दोस्त कहने लगा कि सही कह रहे हो तुम,
इस देश में बिना आरक्षण के हमको कुछ नहीं मिलता ।
हम लोगों को selection के लिए double marks लाने पड़ते हैं,
और फिर भी आरक्षण के कारण हमें job नहीं मिलता ।
गुस्से में तीसरा मित्र बोलने लगा कि सत्य हैं तुम्हारे कथन,
अफसर से लेकर नौकर तक बनने में भी लगता है आरक्षण ।
हमारी जरुरत की चीजें भी हम इस आसानी से नहीं खरीद पाते,
क्योंकि अब हर चीज में तो लगता है आरक्षण ।
फिर पहला दोस्त बोला कि मेरे पास है एक idea,
मेरे बच्चे पैदा होंगे तो उनके शरीर का कोई अंग काट दूँगा ।
चाहता हूँ कि कम marks पर selection हो और आसानी से job मिले,
इसके लिए उनको अपाहिज़ ही बना दूँगा ।
फिर दूसरे ने कहा कि मेरे दिमाग की बत्ती भी जली,
मैं किसी पिछड़ी जाति की कन्या से शादी कर लूँगा ।
फिर अपने बच्चों को उसका sirname ही दे दूँगा,
और उनके जाति प्रमाण-पत्र के फ़र्जी documents भी बनवा लूँगा ।
तीसरे दोस्त के बोलने के पहले ही मैं बोल उठा,
यदि यही होगा तो क्या मतलब है देश में आरक्षण का ?
कोई बच्चों के अंग काट रहा है और कोई अपना ईमान बेच रहा है,
तो फिर फायदा ही क्या है भारत में आरक्षण का ?
जिसमें आरक्षण ही बन गया था अहम् मुद्दा ।
मैंने कहा कि क्या हाल हो गया है आज देश का ?
अब तो मानते हो ना कि है ये आरक्षण भद्दा ।
तभी एक मित्र तपाक से बोला, तुम्हारी बात तो सच है,
लेकिन इससे बचने का क्या है उपाय ?
इससे पीड़ित हो रहे हैं सब लोग,
तुरंत दूसरा दोस्त बोल पड़ा कि कोई फायदा नहीं,
इस देश में हम जैसों की सुनने वाला कोई है ही नहीं ।
औरों को तो मिलता है हर चीज में आरक्षण,
लेकिन हमें तो इस आरक्षण से कोई फायदा ही नहीं ।
फिर पहला दोस्त कहने लगा कि सही कह रहे हो तुम,
इस देश में बिना आरक्षण के हमको कुछ नहीं मिलता ।
हम लोगों को selection के लिए double marks लाने पड़ते हैं,
और फिर भी आरक्षण के कारण हमें job नहीं मिलता ।
गुस्से में तीसरा मित्र बोलने लगा कि सत्य हैं तुम्हारे कथन,
अफसर से लेकर नौकर तक बनने में भी लगता है आरक्षण ।
हमारी जरुरत की चीजें भी हम इस आसानी से नहीं खरीद पाते,
क्योंकि अब हर चीज में तो लगता है आरक्षण ।
फिर पहला दोस्त बोला कि मेरे पास है एक idea,
मेरे बच्चे पैदा होंगे तो उनके शरीर का कोई अंग काट दूँगा ।
चाहता हूँ कि कम marks पर selection हो और आसानी से job मिले,
इसके लिए उनको अपाहिज़ ही बना दूँगा ।
फिर दूसरे ने कहा कि मेरे दिमाग की बत्ती भी जली,
मैं किसी पिछड़ी जाति की कन्या से शादी कर लूँगा ।
फिर अपने बच्चों को उसका sirname ही दे दूँगा,
और उनके जाति प्रमाण-पत्र के फ़र्जी documents भी बनवा लूँगा ।
तीसरे दोस्त के बोलने के पहले ही मैं बोल उठा,
यदि यही होगा तो क्या मतलब है देश में आरक्षण का ?
कोई बच्चों के अंग काट रहा है और कोई अपना ईमान बेच रहा है,
तो फिर फायदा ही क्या है भारत में आरक्षण का ?
No comments:
Post a Comment